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लखनऊ. देश के सबसे बड़े सूबे यूपी में किसी भी राजनीतिक पार्टी (Political Parties) का मुंह ऐसा नहीं है जो अपराधियों को लेकर दो शब्द बोल सके. ऐसा इसलिए क्योंकि कोई भी पार्टी यह दावा करने की स्थिति में नहीं है कि आपराधिक छवि वाले लोग उनकी पार्टी में विधायक, सांसद या पार्टी कार्यकर्ता नहीं हैं. पहले तो कुछ हो हल्ला होता भी था, लेकिन दहशतगर्द विकास दुबे (Vikas Dubey) के मामले में तो एक अजीबोगरीब खामोशी छाई हुई है. अपराधियों को लेकर एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करने वाली यूपी की सभी बड़ी पार्टियां खामोश हैं. उन्हें अच्छे से पता है कि इस जुबानी जंग में उनके भी कपड़े फट जाएंगे. आखिर विकास दुबे सबका लाडला जो रहा है. सभी पार्टियों के नेताओं से उनके ताल्लुकात सामने आ चुके हैं. अभी तक विकास दुबे की यूपी सरकार में मंत्री बृजेश पाठक, पहले बसपा और फिलहाल बीजेपी सांसद अशोक रावत, सपा सरकार में कैबिनेट मंत्री शिव कुमार बेरिया और अरुणा कोरी के साथ फोटो वायरल हो चुकी है. इसी तरह पहले बसपा सांसद और फ़िलहाल कांग्रेस नेता राजाराम पाल के साथ भी फोटो वायरल हो चुकी है. सपा के सतीश निगम के साथ भी फ़ोटो बाहर आ गयी है.

लिहाजा एक-दो ट्वीट करके रस्म अदायगी भर कर ली गई. क्या आपको याद आ रहा है कि घटना के कई दिन बीत जाने के बावजूद किसी ने किसी से इस्तीफा मांगा? बात और तथ्य भले ही three साल पुराने हैं, लेकिन समय बिल्कुल सटीक है. आइये जानते हैं कि इस खामोशी के पीछे असली वजह क्या है? एक बार ये फिर से जानने का समय है कि किस पार्टी में आपराधिक छवि के कितने नेता हैं. बाहर वाले नहीं बल्कि अंदर वाले. मतलब जो विधानसभा में पहुंचे हैं.

यूपी की विधानसभा का दृश्य देखकर आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रदेश में अपराध और राजनीति के बीच तमाम कसमों के बाद भी क्या सांठगांठ चलती आ रही है. हर चुनाव में कैंडिडेट का पूरा ब्यौरा जमा करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) के आंकड़े इस साठगांठ को उजागर करते हैं. 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव के आंकड़े भी एडीआर ने जारी किये थे, तब 403 सीटों वाली विधानसभा में से बीजेपी को 312, सपा को 47, बसपा को 19, कांग्रेस को 7 और अपना दल को 9 सीटें मिली थीं. तीन निर्दलीय भी चुनाव में जीते थे. कुल 402 विधायकों में से 143 ने अपने ऊपर आपराधिक मामले घोषित किए थे. इन सभी रणबांकुरों ने अपने चुनावी हलफनामे में मुकदमों की जो जानकारी दी थी, उससे राजनीति में बढ़ती अपराध की गर्मी को मापा जा सकता है.

बीजेपी के दागीप्रचंड बहुमत की सरकार बनाने वाली बीजेपी के 37 फीसदी विधायकों पर अपराधिक मामले दर्ज हैं. 2017 की विधानसभा में पहुंचे बीजेपी के 312 विधायकों में से 114 पर आपराधिक मामले दर्ज पाए गए थे. इनमें से 83 विधायकों ने अपने ऊपर संगीन आपराधिक मामले दर्ज होने का खुलासा अपने हलफनामे में किया था.

समाजवादी पार्टी
सपा के 47 विधायक 2017 में सदन पहुंचे थे. इनमें से 14 ने अपने ऊपर आपराधिक मामले दर्ज होने की जानकारी दी थी. इन 14 में से 11 के ऊपर संगीन मामले दर्ज हैं.

बसपा

बसपा के 19 विधायक सदन में पहुंचे थे. इनमें से 5 पर आपराधिक जबकि 5 में से Four पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं.

कांग्रेस
कांग्रेस के 7 विधायक सदन पहुंचे थे. इनमें से 1 विधायक पर आपराधिक मामला दर्ज है. इस मामले में सबसे बड़ी बाज़ी निर्दलीयों ने मारी है. तीन निर्दलीय विधायक चुने गये थे और तीनों पर ही संगीन आपराधिक मामले दर्ज हैं.

फिलहाल यूपी की विधानसभा में दलीय स्थिति 2017 के मुकाबले थोड़ी बदल गयी है, क्योंकि उसके बाद उपचुनाव हुए. मौजूदा समय में 403 सदस्यों की विधानसभा में बीजेपी के 307, सपा के 48, बसपा के 18, कांग्रेस के 7 और अपना दल (सोने लाल ) के 9 विधायक शामिल हैं. सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के 4, रालोद और निर्बल इंडियन शोषित हमारा अपना दल के 1-1 विधायक शामिल हैं. निर्दलीयों की संख्या three है. 5 सीटें फ़िरोज़ाबाद की टूंडला, उन्नाव की बांगरमऊ, बुलंदशहर, जौनपुर की मल्हनी और रामपुर की स्वार खाली हैं.

इस मामले में कमोबेश सभी पार्टियों की स्थिति एक जैसी ही है. यही वजह है कि अब कानपुर जैसा हत्याकांड होने के बावजूद भी ज्यादा राजनीतिक सरगर्मी या आरोप-प्रत्यारोप देखने को नहीं मिलती. सभी जानते हैं कि ये यूपी की गटर है, बन्द रहे तो बेटर है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल फरवरी में सभी राजनीतिक पार्टियों को निर्देश दिया था कि वे अपने उन नेताओं की जानकारी वेबसाइट पर डालें जिनके ऊपर आपराधिक मामले चल रहे हैं. क्या पोलिटिकल पार्टियों ने ऐसा किया? नहीं.



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