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देहरादून. देवस्थानम एक्ट को चुनौती देने वाली बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका हाईकोर्ट में खारिज होने में रुलक संस्था की भी अहम भूमिका रही है. रुलक (Rural Litigation and Entitlement Kendra- RLEK) ने इस मामले में कैविएट पिटीशन दाखिल कर देवस्थानम एक्ट के समर्थन में अपना पक्ष रखा था. रुलक ने कोर्ट में कहा था कि उत्तराखंड के मंदिरों के प्रबंधन के लिए बना यह पहला एक्ट नहीं है, बल्कि ऐसा ही कानून 100 साल पुराना है. बदरीनाथ धाम के प्रबंधन में गड़बड़ियां सालों से हो रही हैं. रुलक के संस्थापक अध्यक्ष पद्मश्री अवधेश कौशल कहते हैं कि हाईकोर्ट के फ़ैसले से साबित हुआ है कि मंदिरों में भ्रष्टाचार होता है.

हाईकोर्ट में रुलक के तर्क 

संस्था के वकील ने कोर्ट में मनुस्मृति के हवाले से कहा था कि राजा खुद सर्वोपरि है वह अपने दायित्व किसी को भी सौंप सकता है. संस्था ने एटकिंशन के गजेटियर का भी उदाहरण दिया, जिसमें कहा गया कि बदरीनाथ मंदिर में करप्शन है, इसलिए यहां एडमिनिस्ट्रेशन की जरूरत है.

इसके अलावा मदन मोहन मालवीय द्वारा 1933 में मंदिरों में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाए जाने और उसके बाद सेक्यूलर मैनेजमेंट और रिलिजियस एक्ट 1939 बनाए जाने का भी हवाला दिया था. इस कानून में सेक्युलर मैनेजमेंट आफ टेंपल राज्य को दिया गया था जबकि रिलिजियस मैनेजमेंट मंदिर पुरोहित को दिया गया है.सुप्रीम कोर्ट भी जाने की तैयारी 

पद्मश्री अवधेश कौशल कहते हैं कि पहली बात तो यह है कि यह मंदिर प्राइवेट नहीं हैं. यह लोगों ने बनवाए हैं. यहां बेशुमार पैसे के अलावा चांदी-सोना भी चढ़ता है. लेकिन ये लोग सारा खा जाते हैं, कुछ नहीं करते. पहले वैष्णो देवी मंदिर में भी यही होता था.

जब उसे ट्रस्ट बना दिया गया तो सब बदल गया. अब वहां मंदिर के पैसे से ही स्कूल चल रहे हैं, अस्पताल चल रहे हैं. धर्मशालाएं बनाई गई हैं और यूनिवर्सिटी भी बना दी है. यहां क्या है आप देख लो. यह लूट बंद हो, इसलिए ज़रूरी है देवस्थानम बोर्ड.

चार धाम देवस्थानम एक्ट को हाईकोर्ट में चुनौती देने वाले बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने फैसला आने के बाद कहा है कि वह इस केस को सुप्रीम कोर्ट में लेकर जाएंगे. अवधेश कौशल कहते हैं कि अगर ऐसा होगा तो वह सुप्रीम कोर्ट में भी कैविएट डालेंगे.

हरिद्वार के मंदिर भी आएंगे दायरे में 

चार धाम देवस्थानम बोर्ड का विरोध कर रही चार धाम तीर्थ पुरोहित और हक-हकूकधारी पंचायत का कहना है कि सरकार ने सिर्फ़ पहाड़ के 51 मंदिरों को ही कब्ज़ा करना चाहा है. हरिद्वार और मैदानी क्षेत्र के मंदिरों, धार्मिक संस्थाओं को छूने की सरकार की हिम्मत नहीं है. महापंचायत सरकार से हरिद्वार समेत मैदान के मंदिरों और आश्रमों को भी इस बोर्ड के अधीन लाने की मांग कर चुकी है.

अवधेश कौशल कहते हैं कि हरिद्वार के मंदिर भी आएंगे इसके दायरे में. अभी तो बोर्ड का ठीक से गठन भी नहीं हुआ है, पूरी कमेटी भी नहीं बनी है. इस कमेटी में पुरोहितों के eight सदस्य होंगे, जो अभी पांच ही हैं. रुलक के संस्थापक अध्यक्ष कहते हैं कि अगर सरकार गलत करेगी तो हम उसका भी विरोध करेंगे.



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