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नई दिल्ली. कोरोना महामारी (Corona Virus) के बढ़ते प्रकोप के बीच बिहार में विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election 2020) की तैयारी की जा रही है. लेकिन, बड़ा सवाल है कि क्या बिहार (Bihar) में तय वक्त पर इस साल अक्टूबर-नवंबर में चुनाव होंगे या इसे टाल दिया जाएगा. चुनाव आयोग (Election Commission) अपनी तैयारी कर रहा है. हालांकि अभी यह तय नहीं है कि चुनाव समय पर होंगे या टल जाएंगे. लेकिन, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) समेत सभी विपक्षी दल लगातार कोरोना संक्रमण काल में चुनाव कराए जाने के फैसले पर सवाल खड़ा कर रहे हैं.

इसी कड़ी में विपक्षी दलों के नेताओ की मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनो चुनाव आयुक्तों के साथ वर्चुअल मीटिंग हुई, जिसमें आगामी बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर चर्चा हुई.

मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ वर्चुअल मीटिंग में आरजेडी से मनोज झा, कांग्रेस के बिहार प्रभारी शक्तिसिंह गोहिल, वीआईपी पार्टी से राजीव मिश्रा, आरएलएसपी अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के अध्यक्ष जीतनराम मांझी, सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी, सीपीआई से डी.राजा, सीपीआई (एमएल) से दीपांकर भट्टाचार्य और एलजेडी से शरद यादव शामिल हुए.

इसके पहले दिल्ली के कॉन्स्टिट्युशन क्लब में इन नेताओं ने मीटिंग कर चुनाव संबंधी सभी मुद्दों पर चर्चा की.

‘1000 मतदाता वाले पोलिंग स्टेशन में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं होगा’

चुनाव आयोग के साथ मीटिंग के दौरान विपक्षी दलों के नेताओ की तरफ से कहा गया कि 1,000 मतदाता वाले पोलिंग स्टेशन में सोशल डिस्टेंसिंग नहीं हो पाएगी. इसलिए इसे चार हिस्सों में बांटा जाए और हर बूथ पर 250 लोगों के मतदान की व्यवस्था की जाए. इसके अलावा 65 वर्ष के ऊपर वाले मतदाताओं का पोस्टल बैलेट चुनाव आयोग ने रोका है, इसे रोका ही न जाए बल्कि इसे खारिज किया जाए.

विपक्षी दलों का मानना है कि इससे गोपनीयता नहीं रह पाएगी, लिहाजा इसे खारिज कीजिए.

इसके अलावा सबको प्रचार करने के लिए समान अधिकार मिलने की भी मांग की गई. दरअसल विपक्ष को लगता है कि बीजेपी जैसे दल डिजिटल प्रचार के तौर-तरीक से उन पर भारी पड़ेंगे. यहां तक कि संसाधन के मामले में भी उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ेगा. लिहाजा विपक्षी पार्टियां चुनाव परंपरागत तरीके से कराने की मांग कर रही हैं. उनकी तरफ से चुनाव आयोग से कहा गया है कि चुनाव परंपरागत तरीके से हो, न कि डिजिटल तरीके से.

इन दलों का तर्क है कि बिहार में स्मार्टफोन रखने वालों की तादाद कम है लिहाजा, सभी लोगों तक डिजिटल प्रचार के जरिए नहीं पहुंचा जा सकता है. ऐसे में प्रचार भी परंपरागत तरीके से करने की जरूरत है. लेकिन सबकी तरफ से एक बात फिर दोहराई गई कि जान की सुरक्षा पहले है, राजनीति बाद में. फैसला अब चुनाव आयोग को करना है. देखना है आयोग विपक्षी दलों की बातों को ध्यान में रखकर क्या निर्णय लेता है.



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