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नई दिल्ली. लगभग तीन दशक बाद कांग्रेस (Congress) एक बार फिर यूपी की सत्ता में आने के लिए छटपटा रही है. लेकिन, क्या इसके लिए उसकी रणनीति सही दिशा में बढ़ रही है या फिर पार्टी की सक्रियता सिर्फ प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi) के ख़तों और उनके ट्विटर तक ही सीमित है. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस कोई मुद्दा उठाने से छोड़ नहीं रही लेकिन ग्राउंड में कार्यकर्ताओं की कमी से वैसा असर नहीं दिख रहा जैसा बीजेपी (BJP) जैसी संगठन वाली पार्टी से लड़ने के लिए चाहिए. ऐसे में 2022 के चुनाव में कांग्रेस का बेड़ा पार कैसे होगा?

‘24 अकबर रोड’ के लेखक रशीद किदवई कहते हैं, “यूपी में कांग्रेस नए तरह की राजनीति कर रही है. यह राजनीति है नई सोच और नए लोगों की. आज का दौर पर्सनैलिटी आधारित राजनीति का है. जैसे-मोदी एक पर्सनैलिटी हैं, उनके चेहरे पर चुनाव हुआ तो लोगों ने किसी सांसद के बारे में पूछा ही नहीं कि उसने क्या किया बल्कि मोदी के नाम पर वोट दे दिया. प्रियंका ऐसा ही प्रयोग कर रही हैं.”

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राजनीतिक विश्लेषक किदवई कहते हैं, “प्रियंका गांधी ने यूपी की राजनीति में अपनी एक जगह बना ली है. वो जनहित से जुड़े हर पहलू पर योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखती हैं. उसे सार्वजनिक मंच पर उठाती हैं. सोशल मीडिया पर उसे लेकर बहस होती है. इस मामले में वो मायावती (Mayawati) और अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) से कहीं आगे दिख रही हैं. जब यूपी की सियासत में मुद्दों को उठाने और उस पर लड़ने की बात होगी तो योगी के सामने प्रियंका और अजय कुमार लल्लू को ही खड़ा किया जाएगा.”

कांग्रेस के मठाधीशों को साइड करने में कामयाबी!

कांग्रेस पर पैनी नजर रखने वाले कदवई कहते हैं, “प्रियंका गांधी हेडलाइन मैनजमेंट अच्छा कर रही हैं. यूपी में कांग्रेस के सामने यही ट्रैजडी रही है कि करीब दो दशक से उसके पास कोई दमदार चेहरा नहीं था. प्रियंका गांधी ने इस खालीपन को अब भर दिया है. यूपी कांग्रेस की पहली लड़ाई थी खुद कांग्रेस के मठाधीशों से, जिन्हें साइडलाइन करके उन्होंने बिल्कुल नए लोगों की टीम बनाई और नए तेवर से काम शुरू किया.”

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दिल्ली यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सुबोध कुमार कहते हैं, “देखिए, पूरे कोरोना काल में प्रियंका गांधी और अजय कुमार लल्लू सबसे आगे बढ़कर मजदूरों की आवाज उठाते रहे. पीछे-पीछे उन्हीं मुद्दों अखिलेश यादव और मायावती भी सुर में सुर मिलाते रहे. जनता के मसलों को लेकर अजय कुमार लल्लू को जेल तक जाना पड़ा.”

लल्लू के मुकाबले सपा-बसपा के प्रदेश अध्यक्ष कहां हैं?

“क्या कोई जानता है कि सपा और बसपा के प्रदेश अध्यक्षों ने जनता की कितनी आवाज उठाई. क्या वो संघर्ष करते हुए दिखते हैं. इन दोनों पार्टियों के प्रदेश अध्यक्षों के मुकाबले अजय कुमार लल्लू जनता के ज्यादा नजदीक दिखते हैं. ओपीनियन बिल्डर भी यह बात मानते हैं. शायद इसीलिए प्रियंका गांधी ने यूपी कांग्रेस के दिग्गज नेताओं अखिलेश सिंह, प्रमोद तिवारी और आरपीएन सिंह को छोड़कर अजय लल्लू को चुना.”

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क्या सपा-बसपा की चुप्पी से कांग्रेस को होगा फायदा?

जातियों को जोड़े बिना आगे नहीं बढ़ेगी कांग्रेस  

कुमार कहते हैं, “भारत की राजनीति जातियों पर आधारित है. इसलिए कांग्रेस को जातीय समीकरण को फिट करने ही होंगे. यूपी में कांग्रेस को ‘राजपूत-ब्राह्मण’ मामले से फायदा हो सकता है. ओबीसी में गैर यादव ओबीसी खासतौर पर कुशवाहों को बीजेपी में प्रतिनिधत्व मिला हुआ है. लेकिन वहां पर डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य तक की सुनवाई नहीं होती. इसलिए अगर कांग्रेस इस वर्ग को भी प्रतिनिधित्व दे तो इसका बड़ा धड़ा भी उसके साथ जा सकता है. यूपी में जिन लोगों को अखिलेश यादव और मायावती की एक जाति वाली राजनीति से चिढ़ है वो विकल्प के तौर पर कांग्रेस को अपना सकते हैं.”

सिर्फ हेडलाइन मैनजमेंट से काम नहींं चलता

हालांकि, वरिष्ठ पत्रकार बलिराम सिंह कहते हैं कि सोशल मीडिया पर चर्चा से लेकर मुद्दे उठाने तक तो कांग्रेस की मेहनत दिख रही है लेकिन, सिर्फ हेडलाइन मैनजमेंट से काम नहींं चलता. जमीनी स्तर पर कांग्रेस का संगठन नहीं है. जिले और ब्लॉक स्तर पर संगठन के नाम पर कुछ नहीं है. न मेन बॉडी सक्रिय है और न सेवा दल. जबकि यही समय की सबसे बड़ी जरूरत है. हालांकि, प्रियंका गांधी और अजय कुमार लल्लू जो मुद्दे उठा रहे हैं वो सब आम जनता से जुड़े हुए हैं. फिर भी सत्ता में आना है तो कार्यकर्ता बनाने होंगे और संगठन मतबूत करना होगा.”



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