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चीफ जस्टिस (Chief Justice) को लिखे अपने पत्र में अधिवक्ता विशेष राजवंशी ने कहा कि वह यह चिट्ठी इस घटना को लेकर हो रही बदनामी व अपमान की वजह से लिख रहा है.

प्रयागराज. उत्तर प्रदेश में कानपुर (Kanpur) का दुर्दांत अपराधी विकास दुबे (Vikas Dubey) को यूपी एसटीएफ ने एनकाउंटर (Encounter) में मार गिराया है. इसी कड़ी में शनिवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक अधिवक्ता ने 11 जुलाई को कानपुर में एसटीएफ टीम द्वारा एनकाउंटर में मारे गये विकास दूबे मामले की न्यायिक जांच कराने के लिए चीफ जस्टिस को पत्र लिखा है. अधिवक्ता ने कहा है कि विकास दूबे को उज्जैन से वापस कानपुर लाते समय एसटीएफ ने उसे मार दिया है. और घटना को मुठभेड़ बताया जा रहा है. चीफ जस्टिस से इस मामले में स्वतः संज्ञान लेकर न्यायिक जांच बैठाने की राज्य सरकार को निर्देश देने की मांग की गयी है. ताकि लोगों का न्याय की प्रक्रिया में विश्वास बना रहे.

चीफ जस्टिस को लिखे अपने पत्र में अधिवक्ता विशेष राजवंशी ने कहा कि वह यह चिट्ठी इस घटना को लेकर हो रही बदनामी व अपमान की वजह से एक अधिवक्ता के नाते चीफ जस्टिस को लिख रहा है. इस पत्र में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 20, 21 व 39 ए का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि ये सारे अनुच्छेद देश के हरेक नागरिक को उसके मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए है और बताते हैं कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं है.

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कहा गया है कि 10 जुलाई को ही लोग आशंका जाहिर कर रहे थे कि विकास दुबे को पुलिस पकड़ कर एनकाउंटर कर देगी, जो सही निकला. अधिवक्ता ने कहा है कि एनकाउंटर की सत्यता अभी भी अज्ञात है. इसकी विभागीय जांच से निष्पक्ष जांच संभव नहीं है, क्योंकि पुलिस ने स्वयं ही उसे दोषी मानकर उसके साथ न्याय कर दिया है. पत्र में अधिवक्ता ने कहा है कि वह एक वकील के रूप में न्याय प्रक्रिया का माखौल होता हुआ देखकर अपने को असहज महसूस कर रहा है. पुलिस द्वारा इस प्रकार की गयी कार्रवाई अगर दंडविहीन रह जाती है तो देश का हरेक नागरिक भयभीत महसूस करता रहेगा.



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